जीआई टैग से पंजीकृत हुआ मिथिला का मखाना,आसान होगा कमाना

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Delhi: बिहार के मिथिला की शान मखाना को जीआई टैग मिल गया है. मिथिला में एक मशहूर कहावत है, “पग-पग पोखर माछ मखान, सरस बोल मुस्की मुख पान, इ थीक मिथिलाक पहचान’’. केंद्र सरकार ने मिथिला के मखाना को जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग दे दिया है. इससे मखाना उत्पादकों को अब उनके उत्पाद का और भी बेहतर दाम मिल सकेगा. मिथिला के मखाने अपने स्वाद, पोषक तत्व और प्राकृतिक रूप से उगाए जाने के लिए प्रख्यात है.

अबतक बिहार के किस-किस उत्पाद को मिला है GI टैग

इससे पहले बिहार की मधुबनी पेंटिंग, कतरनी चावल, मगही पान, सिलाव का खाजा, मुजफ्फरपुर की शाही लीची और भागलपुर के जरदालू आम को जीआई टैग दिया जा चुका है. केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने ट्वीट करते हुए लिखा है कि, ‘जीआई टैग से पंजीकृत हुआ मिथिला का मखाना,किसानों को मिलेगा लाभ और आसान होगा कमाना. त्योहारी सीजन में मिथिला मखाना को जीआई टैग मिलने से बिहार के बाहर भी लो ग श्रद्धा भाव से इस शुभ सामग्री का उपयोग कर पाएंगे.’

90% मखानों का उत्पादन बिहार के मिथिला में होता है

भारत के 90% मखानों का उत्पादन बिहार के मिथिला में  होता है. मखाना आमतौर पर उपवास में इस्तेमाल होता है तथा यह हेल्दी स्नैकिंग का हिस्सा माना जाता है.. यह ऐसी फसल है, जिसे पानी में उगाया जाता है. मखाने में करीब 9.7 ग्राम प्रोटीन और 14.5 ग्राम फाइबर होता है. यह कैल्शियम का बहुत अच्छा स्रोत है.

क्या है जीआई टैग और किसे मिलता है यह टैग?

वर्ल्‍ड इंटलैक्‍चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, जियोग्राफिकल इंडिकेशंस टैग एक प्रकार का लेबल होता है जिसमें किसी प्रॉडक्‍ट को विशेष भौगोलि‍क पहचान दी जाती है. भारत में संसद की तरफ से सन् 1999 में रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन एक्ट के तहत ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशंस ऑफ गुड्स’ लागू किया था. इस आधार पर भारत के किसी भी क्षेत्र में पाए जाने वाली विशिष्ट वस्तु का कानूनी अधिकार उस राज्य को दे दिया जाता है. ये टैग किसी खास भौगोलिक परिस्थिति में पाई जाने वाली या फिर तैयार की जाने वाली वस्तुओं के दूसरे स्थानों पर गैर-कानूनी प्रयोग को रोकना है. यह टैग खेती से जुड़े उत्पाद, इसका अर्थ है कि किसी खास क्षेत्र में जो चीजें पैदा होती हैं, उसे यह टैग मिल जाता है.जैसे उत्तराखंड का तेजपात, बासमती चावल, दार्जिलिंग टी, भागलपुर का जरदालु आम. हैंडीक्राफ्ट्स के क्षेत्र में भी जीआई टैग दिया जाता है. जैसे बनारसी साड़ी, चंदेरी साड़ी, महाराष्ट्र सोलापुर का चद्दर, कर्नाटक का मैसूर सिल्क,तमिलनाडु का कांजीवरम सिल्क. इसके अलावा खाद्य सामग्री को भी यह टैग दिया जाता है. आंध्र प्रदेश में तिरुपति का लड्डू, राजस्थान की बीकानेरी भुजिया, तेलंगाना के हैदराबाद की हलीम, पश्चिम बंगाल का रसोगुल्ला, मध्य प्रदेश का कड़कनाथ मुर्गा को यह टैग दिया गया है

कैसे मिलता है और कौन देता है GI टैग ?

किसी प्रॉडक्ट के लिए GI Tag के लिए सरकारी स्तर पर आवेदन करना पड़ता है. इसके लिए वहां उस उत्पाद को बनाने वाली एसोसिएशन या कोई कलेक्टिव बॉडी अप्लाई कर सकती है. टैग अप्लाई करने वालों को यह बताना होगा कि उन्हें टैग क्यों दिया जाए. सिर्फ GI टैग बताना नहीं पड़ेगा, प्रूफ भी देना होगा. प्रॉडक्ट की यूनिकनेस के बारे में उसके ऐतिहासिक विरासत के बारे में,क्योंकि सेम प्रोडक्ट पर कोई दूसरा दावा करता है तो आप कैसे मौलिक हैं यह साबित करना होगा.जिसके बाद संस्था साक्ष्यों और सबंधित तर्कों का परीक्षण करती हैं.जीआई टैग को हासिल करने के लिए सबसे पहले चेन्नई स्थित जीआई डेटाबेस में अप्लाई करना पड़ता है. भारत में वाणिज्‍य मंत्रालय के तहत आने वाले डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्‍ट्री प्रमोशन एंड इंटरनल ट्रेड (DIPIT) की तरफ से जीआई टैग दिया जाता है. भारत में ये टैग किसी खास फसल, प्राकृतिक और मैन्‍युफैक्‍चर्ड प्रॉडक्‍ट्स को दिया जाता है. कई बार ऐसा भी होता है कि एक से अधिक राज्यों में बराबर रूप से पाई जाने वाली फसल या किसी प्राकृतिक वस्तु को उन सभी राज्यों का मिला-जुला GI टैग दिया जाता है.

 

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